डॉ. केनेथ पीटर्स और पहला PFS/PSSD/PAS सम्मेलन
PFS, PSSD और PAS पर पहले मेडिकल सम्मेलन के आयोजक यूरोलॉजिस्ट: उन्होंने finasteride लिखना क्यों छोड़ा, और 1,100 मरीज़ों ने उन्हें क्या बताया।
अप्रैल 2026 के आखिर में डॉ. केनेथ पीटर्स (Kenneth Peters) ने वह किया, जो इस क्षेत्र में पहले किसी ने नहीं किया था। वे मिशिगन के Corewell Health William Beaumont University Hospital में यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख हैं। उन्होंने पोस्ट-फ़िनास्टेराइड सिंड्रोम (PFS), पोस्ट-SSRI सेक्शुअल डिस्फ़ंक्शन (PSSD) और पोस्ट-Accutane सिंड्रोम (PAS), तीनों पर एक साथ एक मेडिकल सम्मेलन आयोजित किया। PSSD यानी SSRI या SNRI एंटीडिप्रेसेंट (डिप्रेशन की दवा) बंद करने के बाद भी बनी रहने वाली यौन समस्याएँ। अब तक इन तीनों को तीन अलग-अलग विशेषज्ञताओं के तीन आपस में असंबंधित फ़ुटनोट की तरह देखा जाता था।
SIDEfxHUB के रॉब ने सम्मेलन के दौरान उनसे बातचीत की। जहाँ अलग से न बताया गया हो, नीचे लिखी हर बात उसी बातचीत से है। उद्धरण हमारी अपनी रिकॉर्डिंग से हैं, जिन्हें पढ़ने में आसानी के लिए थोड़ा सँवारा गया है।
वह मरीज़, जिसने उनके दवा लिखने का तरीका बदल दिया
डॉ. पीटर्स का काम उन मरीज़ों के इर्द-गिर्द है, जिनसे दूसरे डॉक्टर हार मान चुके होते हैं। उन्होंने हमें बताया, “मैं उन समस्याओं को देखता हूँ, जिन्हें कोई और नहीं देखना चाहता”। इनमें पेल्विक हिस्से में लंबे समय से बना रहने वाला दर्द, पेशाब करने में दिक्कत और इंटरस्टीशियल सिस्टाइटिस (मूत्राशय की लंबे समय तक रहने वाली सूजन) शामिल हैं। उनके पास आने वाले मरीज़ आमतौर पर पहले ही पाँच-छह दूसरे डॉक्टरों को दिखा चुके होते हैं।
करीब दस साल पहले, इन्हीं मरीज़ों में एक युवक था, जिसने फ़िनास्टेराइड (finasteride; भारत में Finpecia और Finax, 5 mg की गोली Fincar नाम से) ली थी।
“मुझे इसके बारे में ज़्यादा पता नहीं था, न ही मैंने इसके बारे में ज़्यादा सुना था… लेकिन उस पर इसका असर इतना गहरा था कि इसने मुझे बदल दिया। उस दिन के बाद मैंने फिर कभी फ़िनास्टेराइड नहीं लिखी। अपने BPH के मरीज़ों को भी नहीं।”
एक यूरोलॉजिस्ट (मूत्र रोग विशेषज्ञ) के लिए यह एक असाधारण फ़ैसला है। 5 mg की फ़िनास्टेराइड बढ़े हुए प्रोस्टेट (BPH) का एक मानक इलाज है, जो पूरी तरह उनकी अपनी विशेषज्ञता के दायरे में आता है। फिर भी, सिर्फ़ एक मरीज़ के आधार पर उन्होंने यह दवा देना पूरी तरह बंद कर दिया, क्योंकि उनके शब्दों में, “अगर उसके साथ ऐसा हो सकता है, तो यह दूसरे लोगों के साथ क्या कर सकती है?”
दो हफ़्तों में चार मरीज़
दवा लिखने से जुड़े एक निजी फ़ैसले को सम्मेलन तक ले जाने की वजह बने, थोड़े ही समय में एक साथ सामने आए कुछ मामले। दो हफ़्ते से भी कम समय में चार युवा मरीज़ उनके क्लिनिक आए, जिनकी शिकायतें उनके मुताबिक लगभग एक जैसी थीं। पहले इनमें से कोई एक दवा ली गई, फिर अचानक जननांगों में सुन्नपन, एनहेडोनिया (किसी भी चीज़ में आनंद महसूस न कर पाना) और ब्रेन फ़ॉग (ध्यान लगाने और साफ़ सोचने में दिक्कत) शुरू हो गया।
एक मामला फ़िनास्टेराइड के बाद का था, और वह मरीज़ खुद एक डॉक्टर थे। एक मामला PSSD का था। दो मामले Accutane के बाद के थे। एक थे मेडिकल की पढ़ाई की तैयारी कर रहे विद्यार्थी, जो पहले खिलाड़ी थे और पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहे थे। दूसरी थीं तीस की उम्र के शुरुआती सालों में एक महिला, जिनके लक्षण दवा बंद करने के एक-दो दिन के भीतर शुरू हो गए थे।
“ऐसा लगा जैसे कोई मुझसे कह रहा हो कि मुझे कुछ करना होगा।”
इसके बाद उन्होंने गंभीरता से जाँच-पड़ताल शुरू की: संवेदना की जाँच (sensory testing), न्यूरोमॉड्यूलेशन (neuromodulation), शॉकवेव थेरेपी (shockwave therapy), और प्रश्नावली के ज़रिए नतीजों पर नज़र। उनकी टीम ने एक छोटी केस सीरीज़ छापी। उन मरीज़ों की आँखों के कॉर्निया की एक खास जाँच (corneal confocal microscopy) में नसों को ऐसा नुकसान दिखा, जो स्मॉल-फ़ाइबर न्यूरोपैथी (बहुत पतली नसों को नुकसान) की ओर इशारा करता है।
सर्वे के 1,100 जवाबों से क्या सामने आया
फिर उन्होंने और उनके शोध निदेशक ने इसे बड़े स्तर पर ले जाने का फ़ैसला किया। उन्होंने तीनों बीमारियों पर एक गुमनाम ऑनलाइन सर्वे शुरू किया, जिसे IRB (शोध की नैतिकता जाँचने वाली समिति) की मंज़ूरी मिली थी। इसका प्रचार सोशल मीडिया और मरीज़ों की बात रखने वाले संगठनों के ज़रिए किया गया।
“कुछ ही हफ़्तों में हमें तीनों श्रेणियों में 1,100 से ज़्यादा जवाब मिल गए।”
सबसे ज़्यादा जवाब PSSD वाले लोगों से आए, उनके ठीक पीछे PFS वाले लोग थे, और PAS वाले कई सौ लोगों ने भी जवाब दिए। वे बताते हैं कि नतीजों में आत्महत्या के विचार “हद से ज़्यादा” थे। सर्वे के साथ उनका ईमेल दिया गया था, और उस ईमेल पर जो संदेश आए, बातचीत में वे बार-बार उन्हीं पर लौटते हैं:
“मुझे परिवारों या माता-पिता के ईमेल आते रहे, जो पूछते थे कि क्या वे यह सर्वे अपने उस बच्चे की ओर से भर सकते हैं, जिसने आत्महत्या कर ली थी।”
उन्हें मना करना पड़ा, क्योंकि सर्वे सिर्फ़ मरीज़ों के खुद भरने के लिए था, और उन्होंने परिवारों के प्रति संवेदना जताई। वे कहते हैं कि इसी से उन्हें यकीन हो गया कि एक बैठक होनी ही चाहिए।
इस काम का कुछ हिस्सा तब से पेश किया जा चुका है। फ़रवरी 2026 में Society for Urodynamics, Female Pelvic Medicine and Urogenital Reconstruction (SUFU) के सम्मेलन में एक सार (abstract) पेश किया गया, जिसके पहले लेखक डॉ. पीटर्स हैं। इसका शीर्षक है “Post-Drug Syndrome: Urgent Need For Clinician Education and Research” (अंग्रेज़ी में), और यह Neurourology and Urodynamics, Vol. 45, Issue S1 में छपा है। उन्होंने हमें बताया कि उसी हफ़्ते एक और शोध-पत्र छपने के लिए भेजा गया था, और दो और जल्द ही भेजे जाने वाले हैं।
जिन्हें बुलाया, सबने हाँ कहा
वे खुलकर मानते हैं कि वे इस क्षेत्र में बाहर से आए हैं: एक डॉक्टर के तौर पर, न कि दवा के बाद होने वाले सिंड्रोम के शोधकर्ता के तौर पर। उनके अपने शब्दों में, सम्मेलन में आखिरकार पहुँचे 90% लोगों को वे जानते तक नहीं थे। इन बीमारियों पर कुछ भी छापने वाले हर व्यक्ति को ढूँढने के लिए उन्होंने शोध-साहित्य छान मारा। उन्होंने मरीज़ों की बात रखने वाले संगठनों से पूछा कि और किसे वहाँ होना चाहिए, और वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और ऐसे संगठनों को करीब 21 निमंत्रण भेजे।
हर एक ने निमंत्रण स्वीकार किया: अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया भर से। दान में मिले पैसे (philanthropic funding) से ठहरने और खाने का कुछ खर्च निकला; वहाँ पहुँचने का खर्च आने वालों ने खुद उठाया।
“सबका हाँ कहना ही मुझे बता गया कि ऐसी बैठक की कितनी ज़रूरत थी।”
वहाँ मौजूद लोगों में डॉ. इरविन गोल्डस्टीन (Irwin Goldstein) थे, जिनके इमेजिंग (शरीर के अंदर की तस्वीरें लेने वाली जाँच) के काम से यह समझ बनी है कि इन बीमारियों के शारीरिक असर क्या हैं। डॉ. रेचल रुबिन (Rachel Rubin) भी थीं, जो यूरोलॉजिस्ट हैं। उन्होंने इस पर बात की कि मरीज़ों को किसी डॉक्टर से सबसे ज़्यादा क्या चाहिए: जिज्ञासा, और यह मान लेने की तैयारी कि “मुझे अभी नहीं पता”। मरीज़ों की बात रखने वाले वे लोग भी वहाँ थे, जिन्होंने यहाँ तक पहुँचने के लिए सालों बिना पैसे लिए काम किया है। इनमें SIDEfxHUB के अपने रॉब डिक्सन भी शामिल थे।
आगे क्या होगा
वे घबराते हुए सम्मेलन में पहुँचे थे। हर किसी का अपना विषय था, और इस पर अपनी राय भी कि इसका तंत्र (mechanism) शरीर की नसों में है या दिमाग और रीढ़ में (peripheral या central)। वे कहते हैं कि उन्हें या तो किसी बड़ी नाकामी की उम्मीद थी, या किसी शानदार चीज़ की।
यह समूह अब सम्मेलन के नतीजों को एक विस्तृत शोध-पत्र के रूप में लिख रहा है। इसके हिस्से बाँट दिए गए हैं और अगली बैठक की तारीख तय हो चुकी है। उनका आखिरी आकलन पूरा उद्धृत करने लायक है:
“पिछले ढाई दिन इस बैठक में बैठने के बाद आप दवा के बाद होने वाले इन सिंड्रोम को नकार नहीं सकते। इस बात के इतने साफ़ प्रमाण हैं कि शरीर में सच में कुछ हो रहा है, और जब मैं इसमें मरीज़ों पर दोष डालने वाली बात सुनता हूँ, तो मुझे बहुत गुस्सा आता है।”
सीमाओं के बारे में भी वे उतने ही साफ़ थे: उनके पास जवाबों से कहीं ज़्यादा सवाल हैं, फ़ंडिंग सबसे बड़ी रुकावट है, और बैठक में जिन बातों पर चर्चा हुई, उनमें से कोई भी इलाज की सलाह नहीं है। इसकी जगह वे चाहते हैं कि मरीज़ यह जानें कि “प्रतिभाशाली लोगों का एक पूरा समूह (consortium) है, जो जवाब ढूँढने की कोशिश कर रहा है”।
एक कमी का ईमानदारी से ज़िक्र करना ज़रूरी है: इस पहली बैठक में तीनों बीमारियों में से आइसोट्रेटिनॉइन (isotretinoin; भारत में Isotroin और Sotret नाम से मिलती है) वाली बीमारी की बात सबसे कम हुई। SIDEfxHUB के होने की एक वजह यही है: ताकि PAS ऐसी बीमारी न बन जाए, जिसकी बात कमरे में कोई न रख रहा हो।
हमारा धन्यवाद
सम्मेलन आयोजित करने के लिए हम डॉ. पीटर्स का, और वहाँ आने के लिए अपना समय देने वाले हर व्यक्ति का धन्यवाद करते हैं। उसी सम्मेलन में रॉब ने डॉ. विल पावर्स (Will Powers) से उनके जेनेटिक शोध के बारे में भी बात की: वह इंटरव्यू पढ़ें। पूरी बैठक में पेश हुए विज्ञान का एक स्वतंत्र ब्योरा भी है: RxISK ने एक आँखों देखा लेख छापा है (अंग्रेज़ी में), जिसे डॉ. डेविड हीली (David Healy) ने लिखा है, जो खुद वहाँ मौजूद थे।
अगर आपको PFS, PSSD या PAS है, तो सबसे काम की बात यह है कि आप पक्का करें कि आपकी गिनती हो: हमारी मरीज़ों की रजिस्ट्री से जुड़ें और अपने देश के दवा नियामक को अपने साइड इफ़ेक्ट रिपोर्ट करें। विशेषज्ञों की सहमति वाला बयान (consensus statement) हो, या आगे होने वाला ऐसा हर सम्मेलन, सब प्रमाण पर टिके होते हैं। और प्रमाण तब शुरू होते हैं, जब लोग अपना अनुभव दर्ज कराने को तैयार होते हैं।
सभी उद्धरणों का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किया गया है।
यह जानकारी डॉक्टर की सलाह की जगह नहीं ले सकती। अपने इलाज के बारे में कोई भी फ़ैसला लेने से पहले अपने डॉक्टर से बात करें।
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