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लंबे समय की सुरक्षा जाने बिना दवाएँ बाज़ार में कैसे आती हैं

कई दवाएँ लंबे समय के असर पूरी तरह जाने बिना मंज़ूर हो जाती हैं। छोटे ट्रायल क्या नहीं दिखा पाते, और दवा व्यवस्था में ज़्यादा जवाबदेही क्यों ज़रूरी है।

लेखक: Morten Skovप्रकाशित: अपडेट:
लंबे समय की सुरक्षा जाने बिना दवाएँ बाज़ार में कैसे आती हैं

लंबे समय की सुरक्षा की सही जानकारी के बिना दवाएँ बाज़ार में कैसे आती हैं

हमारी सेहत के साथ खतरनाक जुआ

हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जब चिकित्सा की हर प्रगति का जश्न मनाया जाता है। पर एक बेचैन करने वाली हकीकत अक्सर अनदेखी रह जाती है: कई दवाएँ बाज़ार में तब आती हैं, जब उनके लंबे समय के साइड इफ़ेक्ट के बारे में बहुत कम पता होता है। ये दवाएँ तुरंत फ़ायदा दे सकती हैं, लेकिन लंबे समय के जोखिम अक्सर अनजाने रहते हैं, और मरीज़ बिना जाने एक प्रयोग का हिस्सा बन जाते हैं। दवा कंपनियों की ओर से दूरदर्शिता और ज़िम्मेदारी की यह कमी सिर्फ़ चिंता की बात नहीं है, बल्कि खुद इंसानियत के लिए एक संभावित खतरा है।

समस्या: कम समय की जाँच, लंबे समय के नतीजे

ज़्यादातर दवाओं की जाँच कम समय की सुरक्षा और असर के लिए होती है। क्लिनिकल ट्रायल अक्सर कुछ ही महीनों या सालों तक चलते हैं। इनमें तुरंत होने वाले कुछ साइड इफ़ेक्ट सामने आ सकते हैं, लेकिन लंबे समय के जोखिम पहचानने के लिए ये अक्सर बहुत छोटे होते हैं। मंज़ूरी मिलते ही दवाएँ तेज़ी से बाज़ार में आ जाती हैं, बड़े पैमाने पर लिखी जाती हैं और लाखों लोग उन्हें लेते हैं। लेकिन पाँच, दस या बीस साल बाद होने वाले संभावित नतीजों का क्या? जिन मरीज़ों को कोई अनपेक्षित लंबी बीमारी या गंभीर जटिलता हो जाती है, उनके पास ज़्यादा रास्ते नहीं बचते, और वे दवा और अपने लक्षणों के बीच सीधा संबंध साबित करने के लिए जूझते रहते हैं। अक्सर जब तक असलियत सामने आती है, तब तक प्रभावित लोगों के लिए बहुत देर हो चुकी होती है।

अनदेखे खतरे: साइड इफ़ेक्ट साबित न कर पाना

मरीज़ों के साथ होने वाले सबसे बड़े अन्यायों में से एक यह है कि उन्हें साबित करना पड़ता है कि उनकी लंबी स्वास्थ्य समस्याएँ किसी दवा की वजह से हुईं, और यह लगभग असंभव काम है। मरीज़ों को पूरा यकीन हो कि किसी खास दवा से उनके लक्षण शुरू हुए, तब भी दवा कंपनियाँ और दवा नियामक ऐसे वैज्ञानिक प्रमाण माँग सकते हैं, जो किसी एक व्यक्ति के लिए जुटाना मुश्किल, बल्कि असंभव होता है। इससे एक परेशान करने वाला विरोधाभास पैदा होता है: जिन दवा कंपनियों के पास इन साइड इफ़ेक्ट की जाँच के साधन हैं, उन्हीं का इन्हें नकारने में अपना हित भी होता है।

मरीज़ अक्सर अकेले तकलीफ़ झेलते हैं, उन्हें अपवाद मानकर किनारे कर दिया जाता है, और दवा बाज़ार में बनी रहती है। यह सिलसिला सिर्फ़ दुखद नहीं, खतरनाक भी है। हम यही सोचते रह जाते हैं कि फ़ैसले लेने वाले लोग कदम उठाएँ, उससे पहले और कितनी जानें जाएँगी, कितने परिवार टूटेंगे, और कितनी तकलीफ़ अनसुनी रह जाएगी।

दुखद नतीजों के असली उदाहरण

आधुनिक दवाओं का इतिहास ऐसी दवाओं के उदाहरणों से भरा है, जिनके बहुत गंभीर साइड इफ़ेक्ट समय के साथ सामने आए:

  • थैलिडोमाइड (thalidomide) (अंग्रेज़ी में): 1950 के दशक के आखिर में इसे गर्भावस्था में सुबह होने वाली मतली (morning sickness) के इलाज के तौर पर बेचा गया। बाद में थैलिडोमाइड को जन्म से होने वाली गंभीर विकृतियों से जुड़ा पाया गया, और हज़ारों बच्चे हाथ-पैरों की विकृति के साथ पैदा हुए। जब तक दवा बाज़ार से हटाई गई, तब तक हुआ नुकसान ठीक नहीं किया जा सकता था। इससे पता चलता है कि अधूरी जाँच के नतीजे कितने विनाशकारी हो सकते हैं।
  • डाइएथिलस्टिलबेस्ट्रॉल (diethylstilbestrol, DES) (अंग्रेज़ी में): 1940 से 1970 के दशक तक गर्भवती महिलाओं को गर्भपात रोकने के लिए DES दी गई, जबकि इसके असर के प्रमाण सीमित थे। सालों बाद साफ़ हुआ कि DES लेने वाली महिलाओं के बच्चों में इससे दुर्लभ कैंसर और प्रजनन से जुड़ी समस्याएँ हुईं। DES लेने वाली महिलाएँ और उनके बच्चे एक अनियंत्रित प्रयोग का हिस्सा बने, जिसने उनकी ज़िंदगी बदल दी।
  • Vioxx (रोफ़ेकॉक्सिब, rofecoxib) (अंग्रेज़ी में): यह दर्द की दवा Merck ने 1990 के दशक में बाज़ार में उतारी, और Vioxx को पारंपरिक NSAID दर्द-निवारक दवाओं से ज़्यादा सुरक्षित बताकर बेचा गया। लेकिन बाद के अध्ययनों से पता चला कि इससे दिल के दौरे और स्ट्रोक का जोखिम काफ़ी बढ़ गया। 2004 में जब इसे बाज़ार से हटाया गया, तब तक अनुमान है कि अकेले अमेरिका में इससे 60,000 मौतें हो चुकी थीं।
  • फ़िनास्टेराइड (finasteride; भारत में Finpecia और Finax) (अंग्रेज़ी में): यह दवा पुरुषों में बालों के झड़ने और प्रोस्टेट की समस्याओं के लिए बेची जाती है। फ़िनास्टेराइड को यौन, तंत्रिका तंत्र और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े ऐसे साइड इफ़ेक्ट से जोड़ा गया है, जो दवा बंद करने के बाद भी बने रहते हैं। पोस्ट-फ़िनास्टेराइड सिंड्रोम (PFS) के मामले बढ़ रहे हैं, फिर भी दवा कंपनियाँ इन जोखिमों को कम करके बताती आ रही हैं, और अनगिनत पुरुष ऐसे लंबे साइड इफ़ेक्ट झेल रहे हैं, जिन्होंने उनकी ज़िंदगी बदल दी है।

बड़ी तस्वीर: इंसानियत के लिए जोखिम

पूरी मानवता के स्तर पर देखें, तो खतरा यह है कि ऐसी पीढ़ियाँ तैयार हो जाएँ, जिनकी सेहत उन दवाओं ने बिगाड़ी हो, जिन पर उन्होंने कभी भरोसा किया था। अगर दवा कंपनियाँ लंबे समय के असर समझे बिना दवाएँ बाज़ार में लाती रहीं, और दवा नियामक इसकी इजाज़त देते रहे, तो इसके नतीजे विनाशकारी हो सकते हैं। ऐसे भविष्य की कल्पना करें, जिसमें पहले से स्वस्थ लोग कमज़ोर कर देने वाली लंबी बीमारियों से जूझें, सिर्फ़ इसलिए कि सालों पहले ली गई कोई दवा पूरी जाँच के बिना जल्दबाज़ी में बाज़ार में उतार दी गई थी।

अगर ये रुझान बिना रोक-टोक जारी रहे, तो हमें ऐसे स्वास्थ्य संकट का सामना करना पड़ सकता है, जो पूरी की पूरी आबादी की सेहत पर असर डाले। दवा उद्योग में नुकसान को मानने और जवाबदेही तय करने की रफ़्तार धीमी है। इसका मतलब यह हो सकता है कि जब तक हम नुकसान का असली दायरा समझेंगे, तब तक ऐसा नुकसान हो चुका होगा, जिसे पलटा नहीं जा सकता।

ज़्यादा संतुलित और बेहतर नियमों वाली व्यवस्था की ज़रूरत

इस हकीकत को देखते हुए स्वास्थ्य से जुड़े नियमों की एक ज़्यादा संतुलित और जवाबदेह व्यवस्था चाहिए, जिसमें मरीज़ों की आवाज़ ज़्यादा मज़बूत हो और दवा कंपनियों के लिए ऊँचे मानक तय हों। ये कुछ कदम मदद कर सकते हैं:

  1. दवाओं की जाँच ज़्यादा समय तक हो: जिन दवाओं के लंबे समय में गंभीर असर हो सकते हैं, जैसे हार्मोन से जुड़े इलाज, उन्हें बड़े पैमाने पर लिखे जाने से पहले लंबे क्लिनिकल ट्रायल से गुज़रना चाहिए। कम समय की जाँच में तुरंत होने वाले साइड इफ़ेक्ट दिख सकते हैं, लेकिन किसी दवा का पूरा असर समझने के लिए लंबे अध्ययन ज़रूरी हैं।
  2. बाज़ार में आने के बाद निगरानी अनिवार्य हो: मंज़ूरी के बाद भी दवाओं पर कड़ी नज़र रखी जानी चाहिए, ताकि कोई भी नया साइड इफ़ेक्ट पकड़ में आए। मरीज़ों को नए लक्षण रिपोर्ट करने के लिए बढ़ावा मिलना चाहिए, और दवा कंपनियों के लिए ज़रूरी होना चाहिए कि वे मुनाफ़े में कमी की परवाह किए बिना इन रिपोर्टों की आगे जाँच करें।
  3. नियामकों के फ़ैसलों में मरीज़ों की ज़्यादा भागीदारी: जिन मरीज़ों को ऐसे साइड इफ़ेक्ट होते हैं जिनकी कोई वजह समझ नहीं आती, उन्हें अपने अनुभव बताने का मंच मिलना चाहिए। दवा की मंज़ूरी और निगरानी में इन रिपोर्टों को वज़न भी मिलना चाहिए। किन साइड इफ़ेक्ट के साथ किसी दवा को “सुरक्षित” माना जाए, यह तय करने में सिर्फ़ दवा कंपनियों की आवाज़ नहीं होनी चाहिए।
  4. डेटा तक पारदर्शी पहुँच: दवा कंपनियों के लिए क्लिनिकल ट्रायल का डेटा सार्वजनिक करना ज़रूरी होना चाहिए। ज़्यादा पारदर्शिता से स्वतंत्र शोधकर्ता डेटा का विश्लेषण कर पाएँगे, और हो सकता है कि वे ऐसे रुझान और समस्याएँ पकड़ें, जो खुद कंपनियों की नज़र से छूट गए हों।
  5. दवा कंपनियों की ज़्यादा जवाबदेही: अगर यह साबित हो जाए कि किसी दवा से लंबे समय तक रहने वाले गंभीर साइड इफ़ेक्ट होते हैं, तो ज़िम्मेदार कंपनियों को इसके ठोस नतीजे भुगतने चाहिए। सिर्फ़ जुर्माना काफ़ी नहीं है। दवा नियामकों को दवा कंपनियों को इस तरह ज़िम्मेदार ठहराना चाहिए कि मुनाफ़े से ऊपर मरीज़ों की सेहत रहे।

निष्कर्ष

दवा उद्योग ने आधुनिक चिकित्सा में शानदार योगदान दिया है, लेकिन अब हकीकत को परखने का समय है। किसी दवा के लंबे समय के असर को पूरी तरह समझे बिना उसे बाज़ार में नहीं लाना चाहिए। जब मरीज़ों को लगता है कि उनकी सेहत को नुकसान पहुँचा है, तो उन्हें अकेले जूझने के लिए नहीं छोड़ना चाहिए। और समाज को खतरे पहचानने के लिए तब तक इंतज़ार नहीं करना पड़ना चाहिए, जब तक अनगिनत ज़िंदगियाँ प्रभावित न हो जाएँ।

दवाओं की मंज़ूरी और उन पर नियमों के लिए ज़्यादा जवाबदेह और मरीज़ों को केंद्र में रखने वाला तरीका सिर्फ़ ज़रूरी नहीं है, इसमें पहले ही देर हो चुकी है। मरीज़ों को सुरक्षित और असरदार इलाज का हक है, और दवा कंपनियों के लिए ऊँचे मानक तय होने चाहिए। दाँव इतना बड़ा है कि हम अपनी सेहत के साथ जुआ खेलना जारी नहीं रख सकते।

यह जानकारी डॉक्टर की सलाह की जगह नहीं ले सकती। अपने इलाज के बारे में कोई भी फ़ैसला लेने से पहले अपने डॉक्टर से बात करें।

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