PSSD: योगदान देने वाले कारण और मामलों का ब्योरा
एक अध्ययन SSRI लेने के बाद PSSD के जोखिम और लंबे समय तक रहने वाली यौन समस्याओं की पुष्टि करता है, और डॉक्टरों में जागरूकता की ज़रूरत बताता है।

पोस्ट-SSRI सेक्शुअल डिस्फ़ंक्शन: योगदान देने वाले कारणों और मामलों की विशेषताओं की पड़ताल
नए प्रमाण इस ओर इशारा करते हैं कि SSRI (सेलेक्टिव सेरोटोनिन रीअपटेक इनहिबिटर) या SNRI (सेरोटोनिन-नॉरएड्रेनालाईन रीअपटेक इनहिबिटर) दवाओं से जुड़ा सेक्शुअल डिस्फ़ंक्शन कुछ मरीज़ों में दवा बंद करने के बहुत बाद तक बना रह सकता है। इसे अब पोस्ट-SSRI सेक्शुअल डिस्फ़ंक्शन (PSSD) कहा जाता है, यानी SSRI या SNRI एंटीडिप्रेसेंट बंद करने के बाद भी बनी रहने वाली यौन समस्याएँ। इस बीमारी को बेहतर समझने के लिए हाल के एक अध्ययन ने PSSD के मामलों की क्लिनिकल विशेषताओं पर रोशनी डाली है, और इसमें भूमिका निभा सकने वाले कारणों की जाँच की है।
अध्ययन: PSSD के मामलों की पहचान और समझ
Journal of Clinical Psychopharmacology में छपे इस अध्ययन में जोसेफ़ बेन-शीट्रिट (Joseph Ben-Sheetrit) और उनके साथियों ने ऐसे 532 लोगों का सर्वे किया, जिन्हें SSRI/SNRI लेने के बाद सेक्शुअल डिस्फ़ंक्शन हुआ था। मकसद था पैटर्न पहचानना, लक्षणों की गंभीरता आँकना, और दवा लेने और सेक्शुअल डिस्फ़ंक्शन के बीच संबंध की पड़ताल करना।
मुख्य नतीजे: किन पर असर होता है?
532 प्रतिभागियों में से 183 को PSSD के संभावित मामलों के रूप में पहचाना गया, और इनमें से 23 को ऊँची संभावना वाले मामलों में रखा गया। ऊँची संभावना वाले इन मामलों की ये विशेषताएँ थीं:
- SSRI/SNRI से इलाज से पहले यौन क्रिया सामान्य थी
- दवा बंद करने के बाद कम से कम एक महीने तक सेक्शुअल डिस्फ़ंक्शन बना रहा
- ऐसी कोई दूसरी बीमारी, दवा या नशीले पदार्थों का इस्तेमाल नहीं, जो नतीजों को उलझा सकता हो
- एंग्ज़ायटी (लगातार घबराहट और बेचैनी) और डिप्रेशन (अवसाद) का स्तर सामान्य था, जिससे मनोवैज्ञानिक कारण खारिज हो गए
जननांगों में सुन्नपन और आनंद के बिना ऑर्गेज़्म: अहम संकेतक
अध्ययन में पाया गया कि जननांगों में सुन्नपन और ऑर्गेज़्म (चरम सुख) में आनंद न आना, डिप्रेशन के भी और कुल मिलाकर PSSD का मामला होने की संभावना के भी स्वतंत्र संकेतक (independent predictors) थे। दिलचस्प बात यह है कि जननांगों का सुन्नपन मौजूदा सेक्शुअल डिस्फ़ंक्शन से तो जुड़ा था, लेकिन डिप्रेशन या एंग्ज़ायटी से इसका कोई संबंध नहीं मिला। इससे PSSD के लक्षणों में इसकी अलग भूमिका सामने आती है।
और शोध की ज़रूरत
यह अध्ययन अहम जानकारी देता है, लेकिन लेखक इसकी सीमाएँ भी मानते हैं, जैसे प्रतिभागियों के चयन से आया झुकाव (selection bias) और पुराने अनुभवों पर आधारित (retrospective) बनावट। फिर भी ये नतीजे PSSD के असली होने का समर्थन करते हैं। ये इस ओर भी इशारा करते हैं कि इसे डिप्रेशन या एंग्ज़ायटी जैसे दवा से अलग कारणों से पूरी तरह नहीं समझाया जा सकता।
आगे क्या?
यह अध्ययन उन बढ़ते प्रमाणों में जुड़ता है, जो PSSD के होने की पुष्टि करते हैं। लेकिन यह कैसे होता है, और इसका असर असल में कितना बड़ा है, यह समझने के लिए और शोध की ज़रूरत है। जैसे-जैसे जागरूकता बढ़ रही है, यह बहुत ज़रूरी है कि डॉक्टर इस बीमारी को गंभीरता से लें और संभावित इलाज की खोज करें।
पूरा अध्ययन पढ़ें: Post-SSRI Sexual Dysfunction: Clinical Characterization and Preliminary Assessment of Contributory Factors and Dose-Response Relationship (अंग्रेज़ी में)।
यह जानकारी डॉक्टर की सलाह की जगह नहीं ले सकती। अपने इलाज के बारे में कोई भी फ़ैसला लेने से पहले अपने डॉक्टर से बात करें।
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